उत्तराखण्ड

गणतंत्र दिवस: गौण होते गण का पर्व डॉ. सुधीर सक्सेना

गणतंत्र दिवस हमारा राष्ट्रीय पर्व है। एक महान पर्व। इसे हमें सगर्व और सोल्लास मनाना चाहिये। यह औपनिवेशिक-दासता से मुक्ति के करीब ढाई साल के बाद उस ऐतिहासिक प्रसंग से जुड़ा है, जब हमारे नव-स्वतंत्र महादेश ने सार्वभौमिकता अख्तियार की। इस दिन हमारा अपना संविधान लागू हुआ। राजवंश समाप्त हुये। राजे-महाराजे भूतपूर्व की तालिका में वर्गीकृत हुये। गणतंत्र का उदय हुआ। हमारा अपना संविधान लागू हुआ; एक ऐसा संविधान जो गहन-विमर्श और विचार-मंथन के उपरांत अस्तित्व में आया था। संविधान सदाशयी, समदर्शी और सामासिक था। उसमें कोई खोट न था। उसके लिए सब समान थे। ऊंच-नीच, जाति-धर्म, गरीब-अमीर, अस्पृश्य-सवर्ण, सबल-निर्बल, स्त्री-पुरुष, गारे-काले में कोई भेद नहीं। यह जनगण का संविधान था। इसमें, किसी व्यक्ति, समुदाय या युति की नहीं, वी द पीपुल की निर्विवाद और घोषित महत्ता थी। यह हम भारत के लोगों की एक महान लोकतांत्रिक राष्ट्र रचने के स्वप्न और संकल्प की अभिव्यक्ति थी। उसकी पृष्ठभूमि में तरल और सान्द्र अनुभूतियों का सागर लहराता था। वह सबको समान अधिकार, सबको समान अवसर और सबके उत्थान का घोषणा पत्र था। यकीनन यह इतिहास में पहली बार हो रहा था। इस नाते वह क्षण गौरवशाली था, जब हमारा संविधान लागू हुआ। छब्बीस जनवरी का दिनांक इतिहास के फलक पर सुनहरी इबारतों में अंकित हुआ।
हमारी संविधान निर्मात्री सभा में तप:पूत जनों का बाहुल्य था। अधिकांश का व्यक्तित्व स्वतंत्रता-संग्राम की आग में तपे कुन्दन सरीखा था। महात्मा के प्रभामंडल का आलोक ओरछोर व्याप्त था। लक्ष्य स्पष्ट था। संविधान ने बरबस कोटि-कोटि भारतीयों के लिये निर्दिष्ट की ओर बढ़ने की न सिर्फ पीठिका रची, बल्कि उन्हें प्रेरणा, परिवेश, अवसर और संबल भी प्रदान किया। हम आगे बढ़े। अघातों और अवरोधों के बावजूद। स्वप्नदृष्टा प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू ने कहा, आराम हराम है। नये औद्योगिक तीर्थ स्थापित हुये। हरित और श्वेत क्रांति हुई। भारत ने अंतरिक्ष युग में प्रवेश किया। परमाणु विस्फोट से वह महाशक्तियों के क्लब में शरीक हुआ। निर्गुट आंदोलन ने उसे वैश्विक मंच पर प्रतिष्ठा दी। बीसवीं सदी का समूचा उत्तरार्द्ध भारत के चतुर्मुखी विकास और उत्थान का अदभुत कालखंड था। और यह संभव हो सका था हमारे अनूठे संविधान की बदौलत। अर्द्धशती के इस अंतराल में भारतीय प्रतिभाओं ने सारे विश्व को चमत्कृत किया। यकीनन इससे भारत का मान बढ़ा और विश्व के तमाम राष्ट्रों में भारत के प्रति आदर और प्रशंसा का भाव निर्मित हुआ। भारत में विभिन्न धर्मों और जातियों के सह-अस्तित्व ने वैश्विक स्तर पर भारत की अनूठी और आकर्षक छवि निर्मित की। बीती दहाइयों में हमने हमने शीर्ष पदों पर महिलाओं, दलितों और अल्पसंख्यकों को बैठे देखा। इनमें लौह महिला श्रीमती इंदिरा गाँधी ने नया इतिहास रचा और डॉ. एपीजे कलाम जीते-जी भारत रत्न से सम्मानित हुये। किस्सा कोताह यह कि हमारा संविधान हमारी ताकत बना और उसने इस महादेश के मेरुदण्ड को सीधा और सुदृढ़ रखने के साथ-साथ धमनियों और शिराओं में रक्त के प्रवाह को कायम रखा। ऐसा नहीं है कि तीन चौथाई सदी में विकृतियां नहीं पनपीं। देश की परखनली में जब-तब अंत:क्रियाओं से मटमैला अवक्षेप भी उपजा, लेकिन वह कभी भी देश की एकता, अखंडता और सार्वभौमिकता के लिये खतरा नहीं बन सका। यकीनन सत्ताधीशों से गलतियाँ तो हुईं, लेकिन उनकी सदाशयता कभी संदेह के घेरे में नहीं आई। हाँ, हमने एक बड़ी गलती जरूर की कि हमने नागरिकता-बोध और सेक्यूलर मनस विकसित नहीं किया। हमने विभेदकारी, तंग जेहन और मजह?बी तत्वों की जड़ों में म_ा नहीं डाला। फलत: उसमें कल्ले फूटते गये और उनका तेजी से पनपना जारी रहा।
कुछ देर को हम समय के गलियारे में उलटे पांव चलें। संविधान-सभा की बहसों और कार्यवाही को याद करें। संविधान-निर्माताओं के मन में आशंकायें कम नहीं थीं। डॉ. अंबेडकर और उनके सहयोगी भविष्य के खतरों को बूझ रहे थे। सभा के सदस्यों ने जब-तब अपनी चिंताओं का इजहार भी किया था। स्वयं डॉ. अंबेडकर को डर था कि कहीं अच्छा संविधान बुरे हाथों में न चला जाये। पंथनिरपेक्षता को अपनाने के पीछे गहन चिंतन और इतिहास के गूढ़ सबक का हाथ था। संविधान ने सभी पंथों व धर्मों को सम्मान व स्वतंत्रता दी और किसी एक को न तो वरीयता दी और न ही किसी को राजकीय धर्म घोषित किया। यह वक्त का तकाजा था और भविष्य में सर्वांगीण विकास की आधारशिला भी। यह इस महादेश में फासीवाद को रोकने की पेशकदमी भी थी। गौरतलब है कि आजादी से पहले ही 24 जनवरी, सन 47 को सरदार वल्लभ भाई पटेल की सदारत में अल्पसंख्यकों समेत नागरिकों के मौलिक अधिकारों से संबंधित प्रावधान तय करने के लिये सलाहकार समिति का गठन किया गया था, जिसने अपनी रिपोर्ट में जोर देकर कहा था कि देश में समता का अधिकार होना चाहिये, छुआछूत शोषण और भेदभाव की समाप्ति होनी चाहये। एतदर्थ सरकार की ओर से किसी नागरिक के विरुद्ध धर्म, जाति, वर्ग या लिंग के आधार पर भेदभाव नहीं किया जायेगा। रपट में कहा गया था कि छुआछूत को हर हाल में खत्म किया जायेगा और इसमें किसी भी असमर्थता को बरतना अपराध समझा जायेगा।
आज के परिदृश्य को देखें तो चिंता का तब का औचित्य समझ में आता है। संविधान सभा की सारगर्भित कार्यवाही को देखें। सदस्य-द्वय प्रमथ रंजन ठाकुर और सैयद अब्दुल रऊफ ने जो कहा था, वह वक्त की कसौटी पर सही उतर रहा है। सदाशयता, सौजन्य और शालीनता का दायरा सिमटा है और दुराशयता, हिंसा और घृणा का विस्तार बेरोकटोक जारी है। जेमिमा रोड्रिग्स और डॉ0 इनार्मुरहमान के प्रकरण क्या दर्शाते हैं? आज हम घृणा और विद्वेष के विषाक्त वातावरण में जी रहे हैं। इतिहास के गड़े मुर्दे उखाड़े? जा रहे हैं। आद?मी न हुआ, कबर बिज्जू हो गया। वृहत्तर समाज के धार्मिक-सांस्कृतिक उत्सव राजकीय पर्व हो गये हैं। दशा हम देख रहे हैं और दिशा भयावह है। बोगदे का सिरा अराजकता के कुहासे में खुलता है। चिंतनीय यह भी है कि आज गणतंत्र में गण लगातार गौण होता जा रहा है और तंत्र शक्तिशाली। और तो और गण के अनुकूल होने के विपरीत तंत्र स्वेच्छाचारिता की ओर बढ़ रहा है। अतीत में खतरनाक और जहरीली प्रवृत्तियों को इग्नोर या अनदेखा करना भारी पड़ा है। ऐसे में गांधी फिर-फिर याद आते हैं। उनका ताबीज अभी खोया नहीं है। गांधी के सबक और संविधान हमें बचा सकते हैं। अलबत्ता यह आसाँ नहीं, दुश्वार है, मगर हमें संविधान को बचाना होगा। उसमें इस महादेश की आत्मा प्रतिबिंबित है। गणतंत्र दिवस इसी समवेत संकल्प का दिवस है। सदियों बाद अनगिन त्याग और बलिदान से उदित हमारा गणतंत्र अक्षुण्ण रहे, यही हमारा दायित्व है।

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