पर्वत संकल्प
मनोरंजन

अंतस मनदीप – मीरा पाण्डेय

अंतस वो दीप जलता ही रहा.

मेरे मन के भीतर.

मैं कई बार चाही उसे बुझा दू.

ज़ब भी कोशिश की एक टिस सी उठी.

किसे बुझा रहीं आखिर वो मेरे दिल का हिस्सा है.

जिस संग मैं प्रेम में तपी.

जिस संग मैं प्रेम में बँधी.

जिस संग हर कसम ली.

साथ चलने की.

साथ रुकने की.

साथ बुझने की.

क्यों कर मैं उसे बुझा दू.

कितना अंधकार होगा फिर मन में.

कैसे उसे तलाश करुँगी.

कैसे अपने पीर कहूँगी .

कौन गवाह होगा मेरे.

कपोल पे बहते गर्म आंसू के.

ना मैं खुद भी जलूँगी और उसे भी जला रखूगी.

अपने मन के प्रीत समझ कर.

बही तो अब इक साथी है.

जो संग है अंतस मनदीप बन कर.

– मीरा पाण्डेय, दिल्ली

Related posts

दिल्ली के साहित्यकार डॉ राम निवास तिवारी ‘इंडिया’ को मिलेगा काव्य रत्न सम्मान

admin

सो जा मेरी नन्हीं परी – चेतना कपूर

admin

हाउसफुल 5 150 करोड़ी बनने से महज इतने कदम दूर, ठग लाइफ हुई बुरी तरह फुस्स

admin

Leave a Comment